कबीर दास मूर्ति पूजा के प्रबल विरोधी थे तो फिर मूर्ति पूजा क्यों करते हैं कबीरपंथी ….?

कबीर के अज्ञानी चेलो द्वारा बनाया गया कबीर का मंदिर और कबीर की मूर्ति

कबीर दास ने जीवन भर मूर्ति पूजा और साकार ईश्वर की उपासना का विरोध किया। पर समय का फेर देखिये जिन कबीर दास ने जीवन भर मूर्ति पूजा का विरोध किया ,उन्ही कबीर के चेले रामपाल ने कबीर की ही मूर्ति बनाकर, उसी की मूर्ति को भोग लगाकर , उस भोग को प्रसाद कहकर अपने चेलो में बाँटना शुरू कर दिया।

स्वयं को कबीर का अवतार बताने वाला रामपाल

रामपाल की दुकान चल निकली तो उसने पहले कबीर को ईश्वर कहा फिर अपने आपको कबीर का अवतार और ईश्वर कहना आरंभ कर दिया।

निराकार ईश्वर की उपासना का कबीर का उपदेश उनके बीजक तक सिमट कर रह गया और गुरु के गुड़ के चेलो ने पूरी शक्कर बना डाली।

रामपाल के डेरे में हर रोज कबीर दास की मूर्ति/चित्र को भोग लगाना उन्ही की शिक्षा का अपमान करना हैं।

कबीर की मूर्ति व कबीर का मंदिर
मूर्तिपूजा के प्रबल विरोधी की ही मूर्ति ,कबीर का मंदिर व कबीर की मूर्ति

पाखंड को बढ़ावा देने वाला पाखंडी होता हैं और पाखंडी को गुरु अथवा ईश्वर कहने वाला मुर्ख होता हैं। कुछ मुर्ख इस लेख को पढ़ रहे होगे और कुछ पढ़ चुके होगे , उसके बाद भी कबीर दास का अपमान करना अज्ञानता की निशानी हैं।

मूर्खों का यही हाल रहा तो रामपाल के मरने के बाद उसकी भी मूर्ति बनाकर उसे भी भोग लगाना शुरू कर देगे।

अंधों पढ़ो कबीर दास ने मूर्ति पूजा के विरुद्ध क्या कहा हैं:-

पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूं पहार। ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार।।

एक मूर्ति से तो एक चक्की ही अच्छी हैं , कम से कम संसार का भला तो करती हैं।

मन तुम नाहक दुंद मचाये। करी असनान छुवो नहीं काहू पाती फूल चढ़ाये।
मूर्ति से दुनिया फल माँगेअपने हाथ बनाये।यह जग पूजैदेवदेहरातीरथ –वर्तअन्हाये।
चलत –फिरत में पाँव थकित भे यह दुख कहाँ समाये। झूठी काया झूठी माया झूठे झूठे झुठल खाये। 
बाँझिन गाय दूध नहीं देहै माखन कहँ से पाए। साँचे के सँग साँच बसत हैझूठे मारि हटाये।
कहैं कबीर जहँ साँच बसतु हैसहजै दरसन पाये।

मन तू व्यर्थ उलझन में है द्वंद मचा रहा है। फूल पत्ती चढ़ाकर भी कोई आकाश को हाथों से नहीं छु सकता। दुनिया अपने हाथ की बनाई हुई मूर्ति से फल मांगती है और देवी देवताओं की चौखट पूजती है। तीर्थयात्रा पर जाती है , व्रत रखती है और स्नान करती है। इसी चक्कर में चलते चलते पाँव थक जाते है यानी असली ईश्वर का ध्यान करने के बजाय हम कर्मकांडों पे अपना समय गवाते है और उसे भूल जाते है। आखिर यह दुख कहाँ समाएगा। ये काया भी झूठी है और संसार की माया भी झूठी है। हम व्यर्थ ही जूठन खाते फिरते है। बाँझ गाय जब दूध ही नहीं देगी तो मक्खन कहाँ से मिलेगा? सच्चे के साथ सच्चा ही बसता है, झूठे को भगा दो। कबीर कहते है की जहां सत्य का वास है वहां ईश्वर के दर्शन सहज हो जाते हैं।

मूर्तिपूजा के विरोध में कबीरदास ने कहा है : –

कबीर दुनिया देहुरे सीस नवावत जाई ,हिरदा भीतरि हरी बसै, तू ताहि सौ हयौ लाई

केसो कहा बिगाड़िया जो मूड़े सौ बार। मन को काहे न मूड़िये जामें विषय विकार।।

मन मथुरा दिल द्वारका काया काशी जानि। दसवां द्वार देहुरा तामें ज्योति पिछानि॥

मूर्ति पूजकों का विरोध उनकी दुकान कहकर कबीर स्वयं कर रहे हैं और उनके मुर्ख चेले कबीर के नाम की ही दुकान चलाते हैं।

पूजा-घर मेँ मूर्ति, मीरा के संग श्याम। जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम॥

कबीर का कहना हैं की ईश्वर निराकार हैं ,निर्गुण हैं।

रामपाल पाखंडी को देखो , खुद ही स्वघोषित साकार भगवान बने बैठा हैं और अपने चेलो से अपनी पूजा करवा रहा हैं।

कहैं कबीर बिचारि के जाके बरन न गांव । निराकार और निरगुणा है पूरन सब ठांव॥

कबीरदास ने कहा हैं:-

‘‘पाहन केरा पूतरा, करि पूजै करतार। इन्ही भरोसे जे रहे, ते बूडे़ कालीधार।।’’

कबीर दास ने देखों क्या कहा हैं 

‘‘माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।’’

‘‘माला फेरे मन मुखी, तातै कछू न होई। मन माला को फेरता, घट उजियारा होई।।’’

जिसे तुम ईश्वर की भक्ति समझ रहे हो वह निरा अन्धविश्वास हैं एक पाखंडी का अनुसरण करने केबाद भी अगर तुम्हारे आचरण में परिवर्तन नहीं हैं तुम्हारे मन में शुद्धता नहीं हैं तो समझ लो तुम अपनामूल्यवान जीवन एक पाखंडी के पीछे व्यर्थ कर रहे हो।

( https://pakhandkhandani.wordpress.com से साभार )

 
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