समीक्षा से पहले : पद्मावत की रिलीज के विरोध में हो रही हिंसा ने लोगों के मन में किस कदर डर बिठा दिया है, इस बात का पता फिल्म देखने के पहले चलता है. सत्याग्रह, पद्मावत के लिए रखी गई स्पेशल प्रेस स्क्रीनिंग का हिस्सा बना. यह स्क्रीनिंग दिल्ली के सबसे पॉश इलाके के एक शानदार मॉल में रखी गई थी. कई पत्रकार इस दौरान हंसी-मजाक में ही सही, लेकिन करणी सेना और उनके हमलों का जिक्र करते दिखाई दिए. इससे पहले हमें निर्देश दिया गया था कि सोशल मीडिया पर अपनी एक्टिविटी और लोकेशन शेयर नहीं करनी है. साथ ही फिल्म शुरू होने से ठीक पहले हमें अपने मोबाइल फोन बंद करने के लिए भी कहा गया जबकि आमतौर प्रेस प्रिव्यु के दौरान ऐसी कोई पाबंदी नहीं होती.

इन सब बातों से लग रहा था मानो हम जान हथेली पर रखकर फिल्म देखने निकले हैं. खैर, यह बात हमारे लिए अचरज के साथ-साथ थोड़ी राहतभरी भी थी कि हमें अपने आस-पास कुछ वर्दीधारी भी घूमते दिखाई दे रहे थे. इसके अलावा मॉल के दोनों तरफ दिल्ली पुलिस की तीन से चार गाड़ियां भी नजर आ चुकी थीं. यहां इस वाकये के जिक्र का मकसद आपको यह बताना तो है ही कि इस फिल्म की रिलीज को लेकर जो माहौल बना है, उसका देश की राजधानी के थियेटरों में क्या असर महसूस किया जा सकता है. और दूसरी, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस बहाने आप यह भी सोचने के लिए मजबूर होंगे कि हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किससे-क्या खतरा है और हमारी सरकार इस मामले में किस तरफ खड़ी है. खैर, इस पर कभी फुर्सत में चर्चा होगी, फिलहाल फिल्म की चर्चा कर लेते हैं.


निर्देशक संजय लीला भंसाली

लेखक संजय लीला भंसालीप्रकाश कपाड़िया

कलाकार दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह, शाहिद कपूर, जिम सरभ, अदिति राव हैदरी, रजा मुराद, अनुप्रिया गोयनका

रेटिंग 3/5

संजय लीला भंसाली निर्देशित पद्मावत, सेंसर बोर्ड यानी सीबीएफसी के निर्देशों को मानते हुए एक के बाद एक कई डिस्क्लेमर के साथ शुरू होती है. इनमें से पहला डिस्क्लेमर बताता है कि यह फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित है और ऐतिहासिक रूप से सही होने का दावा नहीं करती. इसके बाद के डिस्क्लेमर शूटिंग के दौरान पशु-पक्षियों को हानि न पहुंचाने, किसी की भावनाएं आहत न करने और जौहर प्रथा का समर्थन न करने की बात कहते हैं. यानी कि पहले डेढ़ मिनट आप डिस्क्लेमर ही देखते रहते हैं. इससे यह समझ आता है कि कितनी मान मनौव्वल के बाद फिल्म स्क्रीन तक पहुंच पाई है.

फिल्म में कहानी की बात करें तो इसकी शुरुआत सिंहल देश की राजकुमारी पद्मिनी और मेवाड़ के राजा रावल रतन सिंह की मुलाकात से होती है. यह मुलाकात अगले कुछ ही दृश्यों में शादी में बदल जाती है. इसके समानांतर फिल्म एक दुर्दांत तुर्क-अफगानी युवक से परिचय करवा रही होती है जो इतना बहादुर है कि शुतुरमुर्ग का एक पंख मांगे जाने पर पूरा का पूरा शुतुरमुर्ग हाजिर कर देता है. फिल्म का यह हिस्सा जहां एक तरफ रानी पद्मावती की सुंदरता, विद्वता और रावल रतन सिंह के गहरे प्रेम का परिचय देता है, वहीं दूसरी ओर यह अलाउद्दीन खिलजी के दुस्साहस, वहशीपन और हर नायाब चीज को पाने की चाहत का जिक्र करता है. आगे के दृश्यों में अलाउद्दीन अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मारकर दिल्ली सल्तनत के तख्त पर बैठता है. सुल्तान बनने के बाद उसे पद्मावती की नायाब खूबसूरती का पता चलता है और इसके आगे का किस्सा सबको पता है.

यहां पर इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि जो बात करणी सेना या बाकी राजपूत संगठन कह रहे हैं, संजय लीला भंसाली भी उससे कुछ अलग कहते नजर नहीं आते. पद्मावत पूरी तरह से राजपूती आन-बान-शान का गान लगती है. पद्मावत अपने हर दृश्य से यह जताने की कोशिश करती है कि राजपूत अपनी जुबान और उसूलों के कितने पक्के थे, वहीं बाहरी आक्रमणकारी हर बार केवल अपने छल और कुटिलता से जीत पाए. यहां तक कि रावल रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के बीच फिल्माए गए द्वंद युद्ध के दृश्य भी राजपूतों की बहादुरी और युद्ध कुशलता का नमूना ही पेश करते हैं और रावल को धोखे से मारने की बात कहते हैं. इसके अलावा जौहर के दृश्यों को भी पद्मावत बेहद गरिमामय तरीके से दिखाती है. यहां तक कि इसे इतना ग्लोरिफाई किया गया है कि 2018 का दर्शक यह देखते हुए थोड़ा असहज भी हो सकता है. हालांकि फिल्म देखते हुए आपको इस बात पर यकीन हो जाता है कि राजपूत तब भी समझदारी से काम नहीं ले रहे थे और अब भी.

विवाद की कोई वजह न होने के साथ ही, पद्मावत के साथ बुरी बात यह भी हुई कि यह संजय लीला भंसाली का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट होते हुए भी एक बेहतरीन सिनेमाई अनुभव में नहीं बदल पाती. पूरी भव्यता के बावजूद फिल्म आपका टुकड़ों में ही मनोरंजन कर पाती है. आलीशान महल, राजपूती और अफगानी लिबास, एक बढ़िया प्रेम कहानी औऱ उच्च स्तर के युद्ध दृश्य देखते हुए आप कई बार ‘वाह!’ कहते हैं, लेकिन फिल्म पूरे समय आपका ध्यान खुद पर लगाए रखने में उतनी सफल नहीं हो पाती. इसकी एक वजह फिल्म की लंबाई भी है. करीब पौने तीन घंटे की फिल्म में कई लंबे-लंबे सीक्वेंस आपको बार-बार कहानी के अटक जाने का एहसास करवाते हैं. हालांकि इस बात से इनकार नहीं है कि भंसाली और उनकी टीम हर फ्रेम को एकदम अनूठा और यादगार बनाने के लिए बहुत मेहनत की है, दिए की लौ से लेकर लश्कर के गुजरने पर उड़ने वाली गर्द तक स्क्रीन पर बेहद प्रभावी अंदाज में देखने को मिलती है.

यहां रानी पद्मावती बनकर भी जुड़ी हुई भौंहों वाली दीपिका पादुकोण इतनी सुंदर लगती हैं, जितनी वे पहले कभी नहीं लगी. फिल्म में दीपिका के हिस्से बेहद चुनिंदा संवाद ही आए हैं इसलिए बाकी काम वे अपनी बोलने वाली आंखों और जादूभरी मुस्कुराहट से कर जाती हैं. बेशक, दीपिका ने फिल्म में अच्छा अभिनय किया है, फिर भी यह कहना चाहिए कि वे पद्मावती के किरदार के लिए सही चयन नहीं थीं. यहां पर मजे-मजे में यह कहा जा सकता है कि जिस भूमिका को करने के कारण उनकी ‘नाक’ पर बन आई, उसके लिए हमने कह दिया कि वे सही चयन नहीं थीं, हद है! खैर, मजे-मजाक से इतर फिल्म में दीपिका की चाल और बोलने का तरीका आपको थोड़ा-सा बनावटी लगता है. अपने मान के लिए जौहर तक कर लेने वाली ‘छोटी रानी सा’ को जितना ग्रेसफुल होना चाहिए, वे वैसी नहीं दिख पातीं.

ऐसा ही कुछ रावल रतन सिंह बने शाहिद कपूर के साथ है. वे अपने संवाद बोलने में तो कमाल करते हैं, लेकिन उनके चेहरे की मासूमियत, राजपूती मूंछों के पीछे जाकर भी ओज में नहीं बदल पाती. उनका सांवला रंग और सुघड़ शरीर देखकर आप मोहित होते हैं, लेकिन उनकी आंखों का काजल आपको एक बार फिर खटक जाता है. वहीं रतन सिंह से उलझने वाले अलाउद्दीन खिलजी यानी रणवीर सिंह पद्मावत में सारा ध्यान खींचते हैं. चेहरे पर जख्मों के निशान लिए और ज्यादातर वक्त तलवार या शरीर पर खून लगाए नजर आने वाले रणवीर को देखकर घिन की झुरझरी दौड़ जाती है. हालांकि यह उनका सबसे अच्छा काम नहीं है, लेकिन इसे उनके बेहतरीन परफॉर्मेंसेज में जरूर गिना जा सकता है. फिल्म में वे कुछ ऐसे दुर्दांत दृश्यों को अंजाम देते नजर आते हैं जिन्हें स्क्रीन पर देखना भी आपके लिए मुश्किल हो सकता है.

जलालुद्दीन खिलजी की छोटी सी भूमिका में रजा मुराद आपको याद रह जाते हैं. सुल्तान के तख्त पर बैठे हुए उन्हें जितना भीमकाय दिखाया गया है, उसे देखकर मुंह से यही तीन शब्द निकलते हैं – इतना बड़ा आदमी! बेहद खूबसूरत अदिति राव हैदरी और जिम सरभ भी अलाउद्दीन के कई पक्षों को दिखाने में अपनी जरूरी भूमिकाएं निभाते हैं. दूसरी तरफ नागमती बनी अनुप्रिया गोयनका कुछ हद तक बनावटी लगने वाला अभिनय करती हैं, लेकिन स्क्रीन पर अच्छी लगती हैं.

बेशक, बाहुबली – द कन्कलूजन के बाद पद्मावत एक विजुअल ट्रीट है. इसमें अभिनय, निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी औऱ संगीत उच्च स्तर का तो है लेकिन ऊपर-ऊपर ही छूकर गुजरता महसूस होता है. अफगानी संस्कृति और राजपूती शान दिखाने वाले थ्रीडी के प्रभावशाली इफेक्ट्स को साथ देखने पर फिल्म मनोरंजक तो लगती है, लेकिन कुछ चूक जाने का एहसास भी बना रहता है.

चलते-चलते – करणी सेना के दिमाग में जाने किस जख्म का मवाद जमा था जिसने इतने विवाद खड़े कर दिए. इसके बाद उन्हें पहचान मिल गई है और फिल्म को पब्लिसिटी, सो अब उस मवाद और विवाद दोनों को ही बहा देने के लिए यह फिल्म देख ली जानी चाहिए.

satyagrah.scroll.in से साभार